उदंती सीता नदी अभ्यारण्य में प्रशासन ने शुरू की तैयारी, जापानी तकनीक मियावाकी से बनेगा घना जंगल

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गरियाबंद। उदंती सीता नदी अभ्यारण्य इलाके में 400 अतिक्रमणकारियों ने 7 से ज्यादा गांव बसाया था. 2010 से 2020 के बीच 10 सालों में इसके लिए 1.50 लाख से ज्यादा पेड़ काट डाले थे. सैटेलाइट इमेजरी ने इसकी पुष्टि किया था.लगातार साफ हो रहे जंगल को बचाने उदंती सीता नदी अभ्यारण्य के उपनिदेशक वरुण जैन ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू किया. 2022 से अभियान शुरू कर साल भर के भीतर सोरनामाल, गोहरामाल, टांगरान, इचरादी, घोड़ागांव, नवापारा गोना, कारीपानी बूडरा जैसे सात जंगलों में बसे अतिक्रमणकारियों को खदेड़ दिया. वर्ष 2024 जंगल में हरियाली बहाल करने की बड़ी चुनौती थी. जिस पर भी विभाग ने बखूबी काम कर दिखाया है.

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125 हेक्टेयर में 75 हजार पौधे पहली बारिश में लगाए

बेदखली के बाद 2024 के पहली बारिश में अभ्यारण्य प्रशासन ने 125 हेक्टेयर में 75 हजार पौधे लगाए. सोरनामाल में 64000, कारीपानी में 6000, करला झर में 5000 पौधे लगाए गए. देख रेख के लिए विभागीय कर्मी के साथ साथ वन सुरक्षा समिति को भी भागीदार बनाया. अब पौधे डेढ़ से दो फीट के हो गए हैं. लाल बंजर जैसे दिखने वाली जंगल के हिस्से में हरियाली की चादर धीरे धीरे चढ़ने लगी है.

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50 एकड़ से ज्यादा हिस्से में 13000 कंटूर बंड बनाया

पौध रोपण के साथ पौधों के पोषण के लिए अभ्यारण्य प्रशासन ने रोपनी इलाके के अन्य हिस्से में 50 एकड़ से ज्यादा रकबे में 13000 कंटूर बंड बनाया. इससे इलाके का वाटर लेबल भी रिचार्ज हुआ है. गर्मी के बाद इस साल इससे ज्यादा कंटूर बंड बनाने का लक्ष्य रखा गया है.

अगली बारिश में जापानी तकनीक का होगा इस्तेमाल

उपनिदेशक वरुण जैन ने बताया कि प्लांटेशन में खर्च ज्यादा हो रहे थे. पीएम ने जन मन में अपनी बात में जापानी तकनीक मियावाकी का जिक्र किया था. इसी तकनीक से अब आने वाले बरसात में घने वन बनाने की तैयारी हो रही है. जैन ने बताया कि इस तकनीक में प्लांटेंशन की तरह निर्धारित दूरी के बजाए प्राकृतिक जंगल की तरह पौधे व सीड लगाया जाएगा. इस तकनीकी में खर्च कम आयेंगे और घने जंगल का स्वरूप तैयार होगा. कराए जा रहे कार्य में पूरी पारदर्शिता लाने ड्रोन मैपिंग कराया गया है जिसे पोर्टल में अपलोड किया गया ताकि कोई भी काम की प्रगति को आसानी से देख सके.

आगे उन्होंने ने बताया कि अतिक्रमण हटाए जाने के बाद जंगली जानवरों का विचरण इलाका बढ़ा है. हरे घास और अन्य पौधे भी उग आए हैं जो जंगली जानवरों के चारे का काम आ रहा है. मानव वन्य प्राणी द्वंद भी नहीं के बराबर दिख रहा.

जानिए क्या है जापानी मियावाकी तकनीक

मियावाकी तकनीक एक खास तरह की वृक्षारोपण विधि है जो जापान के वनस्पतिशास्त्री अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित की गई थी. इस तकनीक में प्राकृतिक जंगल की नकल करने के लिए छोटे-छोटे पौधों को बहुत घनत्व के साथ एक ही स्थान पर लगाया जाता है. इस विधि का मुख्य उद्देश्य है जल्दी से एक घना और प्राकृतिक वन तैयार करना, जो पारंपरिक वृक्षारोपण विधियों से कहीं अधिक तेजी से विकसित होता है

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